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मुंगेली ब्रेकिंग: सरगांव थाने में वर्दी की आड़ में वसूली का आरोप! बेटी की बरामदगी के लिए परिजनों ने भरे ₹3,500, अब न्याय के लिए भटक रहा परिवार

 



🚨 मुंगेली ब्रेकिंग: सरगांव थाने में वर्दी की आड़ में वसूली का आरोप! बेटी की बरामदगी के लिए परिजनों ने भरे ₹3,500, अब न्याय के लिए भटक रहा परिवार

गूंगी-बहरी महिला और दो साल के मासूम के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल; थाना प्रभारी और जांच अधिकारी कौशिक की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग

सरगांव/मुंगेली। जिस पुलिस पर पीड़ितों को न्याय दिलाने और असहाय लोगों की मदद करने की जिम्मेदारी है, उसी पुलिस की कार्यप्रणाली पर मुंगेली जिले के सरगांव थाने में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक गूंगी-बहरी महिला और उसके दो वर्षीय मासूम बच्चे से जुड़े मामले में पीड़ित परिवार ने पुलिस पर लापरवाही, बरामदगी के लिए निजी वाहन का खर्च परिजनों से दिलवाने और जांच अधिकारी द्वारा कथित तौर पर राजीनामे का दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

परिवार का आरोप है कि बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी उन्हें राहत के लिए लगातार थाने के चक्कर काटने पड़े। सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि पुलिस ने बरामदगी के लिए निजी वाहन का इस्तेमाल किया, तो उसका खर्च पीड़ित परिवार से क्यों लिया गया? क्या इसकी कोई आधिकारिक रसीद दी गई? और यदि राशि ली गई, तो उसका हिसाब कहां है?

इन सवालों पर अब थाना प्रभारी, जांच अधिकारी और मुंगेली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।

🔴 बरामदगी के लिए निजी गाड़ी, परिजनों से ₹3,500 लेने का आरोप

पीड़ित परिवार के अनुसार, उन्होंने अपनी गूंगी-बहरी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट सरगांव थाने में दर्ज कराई थी। परिवार का आरोप है कि महिला की बरामदगी के लिए पुलिस ने शासकीय वाहन की व्यवस्था करने के बजाय उनसे ही निजी गाड़ी बुक करवाने को कहा।

परिजनों का दावा है कि वाहन के किराये के रूप में उन्हें ₹3,500 खर्च करने पड़े।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि बरामदगी जैसी पुलिस कार्रवाई के लिए निजी वाहन का खर्च किसके निर्देश पर पीड़ित परिवार से लिया गया? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश था? क्या राशि की रसीद दी गई? यदि नहीं, तो इस पूरे मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

एक ओर परिवार अपनी बेटी की तलाश में परेशान था, वहीं दूसरी ओर उसे वाहन की व्यवस्था और खर्च भी उठाना पड़ा—ऐसा आरोप परिजनों ने लगाया है।

🔴 लोकेशन की जानकारी होने के बावजूद देरी क्यों? परिवार ने उठाए सवाल

परिवार का आरोप है कि महिला के संभावित ठिकाने की जानकारी पुलिस को पहले से थी, फिर भी उसकी बरामदगी में देरी हुई। परिजनों का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास करने पड़े और अंततः निजी वाहन की व्यवस्था करने के बाद ही बरामदगी हो सकी।

यदि पुलिस को संबंधित स्थान की जानकारी पहले से थी, तो कार्रवाई में देरी किन कारणों से हुई? क्या इस देरी की जांच की गई? क्या संबंधित अधिकारियों ने अपनी कार्रवाई का रिकॉर्ड वरिष्ठ अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया है?

इन सवालों का जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों से मिलना चाहिए, ताकि मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

🔴 बरामदगी के बाद भी न्याय के लिए भटकने का आरोप

परिजनों का कहना है कि महिला और उसके दो वर्षीय बच्चे की बरामदगी के बाद भी मामले में अपेक्षित कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।

परिवार ने आरोप लगाया है कि:

  • महिला की चिकित्सकीय जांच कराने के लिए उन्हें मुंगेली, पथरिया और बिलासपुर के चक्कर स्वयं की लागत से लगाने पड़े।
  • महिला का बयान दर्ज कराने के लिए साइन लैंग्वेज विशेषज्ञ की सहायता से ब्यान दर्ज होने के बाद भी आगे की कार्यवाही पूर्ण नहीं ।
  • न्यायालय में बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी करवाने  परिवार पूर्ण रूप से परेशान है।
  • संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध आवश्यक कानूनी धाराओं में कार्रवाई को लेकर भी परिजनों में असंतोष है।

यदि ये आरोप सही हैं, तो यह जांच की प्रक्रिया और पीड़िता को समय पर सहायता उपलब्ध कराने के संबंध में गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

एक ऐसी महिला, जो सामान्य तरीके से अपनी बात नहीं रख सकती, उसके बयान और शिकायत को दर्ज करने में विशेष संवेदनशीलता बरतना बेहद जरूरी है। ऐसे मामलों में संचार की उपयुक्त व्यवस्था, आवश्यक सहायता और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

हालांकि, मामले में अब तक की गई कार्रवाई, मेडिकल परीक्षण की स्थिति, न्यायालयीन बयान और लागू कानूनी धाराओं की वास्तविक स्थिति पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होना बाकी है।

🔴 जांच अधिकारी प्रधान आरक्षक कौशिक पर राजीनामे का दबाव बनाने का आरोप

इस पूरे मामले में सरगांव थाने में पदस्थ जांच अधिकारी प्रधान आरक्षक कौशिक की भूमिका को लेकर पीड़ित परिवार ने गंभीर आरोप लगाए हैं।

परिजनों का दावा है कि उन्हें बार-बार थाने बुलाया जाता है और कथित तौर पर राजीनामा करने के लिए दबाव बनाया जाता है। परिवार के अनुसार, उन्हें मामले के लंबा खिंचने और न्याय मिलने में कठिनाई होने जैसी बातें कहकर समझौते के लिए प्रेरित किया गया।

परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि पीड़िता को मानसिक रूप से परेशान किया गया और आरोपी पक्ष के साथ समझौता करने के लिए दबाव बनाया गया।

अब सवाल यह है कि क्या जांच अधिकारी का उद्देश्य निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है या पीड़ित परिवार को समझौते के लिए प्रेरित किया जा रहा है?

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए प्रधान आरक्षक कौशिक की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही, थाना प्रभारी की भूमिका और मामले की निगरानी में बरती गई कार्यप्रणाली की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि फिलहाल ये आरोप पीड़ित परिवार की ओर से लगाए गए हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।

🔴 थाना प्रभारी की जवाबदेही भी तय हो: आखिर किसकी निगरानी में हुई जांच?

यदि थाने में किसी मामले की जांच के दौरान पीड़ित परिवार को बार-बार परेशान होना पड़ रहा है, बरामदगी के लिए निजी वाहन का खर्च उठाने का आरोप लग रहा है और जांच अधिकारी पर समझौते का दबाव बनाने की शिकायत सामने आ रही है, तो केवल जांच अधिकारी ही नहीं, बल्कि थाना स्तर पर पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए।

इस मामले में थाना प्रभारी को स्पष्ट करना चाहिए कि:

  • क्या उन्हें पीड़ित परिवार से निजी वाहन के लिए ₹3,500 खर्च करवाए जाने की जानकारी थी?
  • क्या वाहन के इस्तेमाल और खर्च का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध है?
  • महिला की बरामदगी और उसके बाद की कानूनी कार्रवाई की नियमित समीक्षा की गई?
  • क्या पीड़ित परिवार ने राजीनामे के दबाव की शिकायत की थी?
  • यदि शिकायत मिली थी, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला प्रक्रियागत लापरवाही का है या किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन की आशंका है।

🔴 मुंगेली पुलिस अधीक्षक के सामने पांच बड़े सवाल

1. ₹3,500 का हिसाब कौन देगा? यदि बरामदगी के लिए निजी वाहन का किराया पीड़ित परिवार ने दिया, तो यह खर्च किसके निर्देश पर कराया गया? क्या इसकी रसीद, भुगतान का रिकॉर्ड और आधिकारिक स्पष्टीकरण उपलब्ध है?

2. बरामदगी में देरी की जिम्मेदारी किसकी है? यदि पुलिस को महिला के ठिकाने की जानकारी पहले से थी, तो कार्रवाई में कथित देरी के कारणों की जांच कौन करेगा?

3. दिव्यांग महिला के बयान और मेडिकल की प्रक्रिया में देरी क्यों हुई? क्या आवश्यक विशेषज्ञ सहायता समय पर उपलब्ध कराई गई? मेडिकल और न्यायालयीन बयान की वर्तमान स्थिति क्या है?

4. क्या जांच अधिकारी ने राजीनामे के लिए दबाव बनाया? यदि परिवार की शिकायत सही है, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच और उचित कार्रवाई कब होगी?

5. दो वर्षीय बच्चे और उसकी मां के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या महिला को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई गई? क्या उसकी सुरक्षा, पुनर्वास और बच्चे के हितों से संबंधित जरूरतों का आकलन किया गया?

🔴 मानवाधिकार आयोग और वरिष्ठ अधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग

पीड़ित परिवार की मांग है कि मामले में मुंगेली पुलिस अधीक्षक, बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक तथा संबंधित महिला एवं मानवाधिकार आयोगों को शिकायत देकर निष्पक्ष जांच कराई जाए।

परिवार की मांगों में प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • निजी वाहन के किराये के रूप में कथित तौर पर दिए गए ₹3,500 के भुगतान और उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जांच।
  • बरामदगी में कथित देरी तथा उसके कारणों की समीक्षा।
  • महिला के मेडिकल परीक्षण, विशेषज्ञ की सहायता से बयान और न्यायालयीन बयान से संबंधित रिकॉर्ड की जांच।
  • जांच अधिकारी प्रधान आरक्षक कौशिक पर लगाए गए राजीनामे के दबाव के आरोपों की स्वतंत्र जांच।
  • थाना प्रभारी की निगरानी और मामले में अब तक की गई कार्रवाई की समीक्षा।
  • उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित थाने के CCTV फुटेज, ड्यूटी रिकॉर्ड, वाहन संबंधी दस्तावेज और अन्य प्रासंगिक साक्ष्यों की जांच।
  • आरोप प्रमाणित होने पर संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई।
  • पीड़िता और उसके परिवार को बिना किसी दबाव के निष्पक्ष जांच तथा आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना।

⚖️ अब जवाबदेही से नहीं बच सकते जिम्मेदार अधिकारी

यह मामला केवल ₹3,500 के कथित वाहन खर्च तक सीमित नहीं है। सवाल एक ऐसी महिला के अधिकारों का है, जो अपनी बात सामान्य तरीके से नहीं रख सकती, और एक ऐसे छोटे बच्चे का है, जिसकी सुरक्षा तथा हितों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

यदि पीड़ित परिवार के आरोपों में सच्चाई है, तो मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। वहीं, यदि आरोप सही नहीं पाए जाते हैं, तो जांच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने चाहिए।

मुंगेली पुलिस अधीक्षक से अपेक्षा है कि वे मामले का संज्ञान लेकर थाना प्रभारी और जांच अधिकारी की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा कराएं तथा पीड़ित परिवार को जांच की प्रगति से अवगत कराएं।

क्योंकि पुलिस व्यवस्था पर जनता का भरोसा तभी मजबूत होगा, जब पीड़ित को न्याय के लिए बार-बार भटकना न पड़े और वर्दी में तैनात हर अधिकारी की जवाबदेही सुनिश्चित हो।

अब देखना यह है कि मुंगेली पुलिस इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कर पीड़ित परिवार को राहत दिलाती है या यह परिवार न्याय की उम्मीद में आगे भी थाने के चक्कर काटता रहेगा।

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