कोटा की जीवनदीप समितियों में ₹1.45 करोड़ की गड़बड़ी का मामला
₹12.26 लाख की वसूली के आदेश, पांच साल बाद भी हिसाब कहां? ऑडिट रिपोर्ट के बावजूद कार्रवाई पर सवाल
2020 की संपरीक्षा में सामने आई वित्तीय अनियमितता और अनधिकृत व्यय का मामला; 2021 में कई बार जारी हुए वसूली के निर्देश, अब CMHO कार्यालय से जवाबदेही तय करने की मांग
बिलासपुर। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के दावों के बीच कोटा विकासखंड की जीवनदीप समितियों से जुड़ा एक पुराना मामला फिर सवालों के घेरे में है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उपसंचालक, स्थानीय निधि संपरीक्षा, बिलासपुर की वर्ष 2020 की संपरीक्षा में विभिन्न जीवनदीप समितियों के वित्तीय अभिलेखों में ₹1,45,50,180 की कथित वित्तीय अनियमितता एवं अनधिकृत व्यय का उल्लेख किया गया था। इसी मामले में ₹12,26,456 की राशि वसूल कर जीवनदीप समिति के खाते में जमा कराने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वर्ष 2021 में ही वसूली के लिए पत्र जारी किए गए थे, तो अब तक कितनी राशि वास्तव में वसूल हुई? कितनी रकम बकाया है? और यदि वसूली लंबित है, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कार्रवाई की गई?
ऑडिट में लाखों की वसूली का मामला, लेकिन कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने की मांग अब भी बरकरार है।
पांच साल से अधिक समय बीता, वसूली का हिसाब कौन देगा?
प्राप्त विवरण के अनुसार, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), बिलासपुर ने 9 मार्च 2021 को पत्र जारी कर कोटा विकासखंड की संबंधित जीवनदीप समितियों के सचिवों से राशि वसूलने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. निखिलेश गुप्ता द्वारा 2 जून 2021, 29 जुलाई 2021 और 11 दिसंबर 2021 को भी संबंधित सचिवों को पत्र जारी किए जाने का उल्लेख है।
यानी वसूली का विषय विभागीय स्तर पर उठाया गया था। लेकिन पत्र जारी करना और राशि की वास्तविक वसूली होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
यदि निर्धारित राशि की वसूली पूरी हो चुकी है, तो विभाग को जमा राशि और संबंधित बैंक अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि वसूली अब भी लंबित है, तो यह बताना आवश्यक है कि इसके पीछे क्या कारण हैं और आगे की कार्रवाई के लिए क्या समय-सीमा निर्धारित की गई है।
दस स्वास्थ्य संस्थानों की जीवनदीप समितियां सवालों के घेरे में
यह मामला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोटा के अंतर्गत संचालित दस प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों की जीवनदीप समितियों से संबंधित बताया गया है।
इनमें रतनपुर, केंदा, आमागोहन, करगी कला, शिवतराई, टेंगनमाड़ा, चपोरा, नवागांव, बेलगहना और पोड़ी के स्वास्थ्य संस्थान शामिल हैं।
जीवनदीप समितियों का उद्देश्य स्वास्थ्य संस्थानों की सेवाओं और सुविधाओं को बेहतर बनाना है। ऐसे में इनके वित्तीय लेन-देन में अनियमितता की ऑडिट आपत्तियां सामने आने पर मामले की गंभीरता से जांच आवश्यक हो जाती है।
संबंधित समितियों की कैशबुक, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान वाउचर, बिल, स्टॉक रजिस्टर और खरीद संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि ऑडिट में दर्ज आपत्तियां किन मदों से संबंधित थीं और उनका निराकरण किस स्तर तक हुआ है।
CMHO कार्यालय से सवाल: वसूली और कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है?
मामले में वर्ष 2022 से पदस्थ CMHO बिलासपुर के कार्यकाल के दौरान हुई कार्रवाई की स्थिति भी स्पष्ट किए जाने की मांग उठ रही है।
क्या पुराने ऑडिट प्रकरण की समीक्षा की गई? क्या संबंधित समितियों से वसूली की प्रगति रिपोर्ट मांगी गई? क्या लंबित राशि का सत्यापन किया गया? क्या ऑडिट आपत्तियों के निराकरण के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई?
इन सवालों का जवाब विभागीय अभिलेखों और आधिकारिक पक्ष से मिलना चाहिए।
यदि वसूली लंबित है, तो उसके कारणों की जांच और आगे की कार्रवाई आवश्यक है। वहीं, यदि राशि जमा हो चुकी है, तो जमा राशि और वसूली की तारीखों का विवरण सार्वजनिक किए जाने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
तत्कालीन BMO डॉ. निखिलेश गुप्ता की भूमिका की जांच की मांग
शिकायत में तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. निखिलेश गुप्ता की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि राशि वसूली के लिए पत्राचार होने के बावजूद वसूली सुनिश्चित करने की दिशा में हुई कार्रवाई स्पष्ट नहीं है।
इस मामले में यह जांचना जरूरी है कि तत्कालीन BMO ने अपने अधिकार क्षेत्र में क्या कदम उठाए, संबंधित सचिवों से क्या जवाब प्राप्त हुए और राशि जमा नहीं होने की स्थिति में उच्च अधिकारियों को क्या जानकारी दी गई।
यदि जांच में किसी स्तर पर कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। इसकी पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही हो सकती है।
स्टोर प्रभारी और बड़ी खरीदारियों पर भी पारदर्शिता की मांग
शिकायत में जिला कार्यालय के स्टोर प्रभारी की जिम्मेदारी और बड़ी खरीदारियों में संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इन बिंदुओं पर स्पष्टता के लिए खरीद आदेश, स्वीकृति पत्र, बिल, भुगतान विवरण, स्टॉक रजिस्टर और सामग्री प्राप्ति के अभिलेखों की जांच जरूरी है।
फिलहाल उपलब्ध विवरण से इन खरीदारियों में अलग से किसी अनियमितता की पुष्टि नहीं होती। इसलिए इस पहलू को भी दस्तावेजों के आधार पर जांचा जाना चाहिए, ताकि तथ्य और आरोप के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे।
₹1.45 करोड़ की ऑडिट आपत्ति और ₹12.26 लाख की वसूली—दोनों का हिसाब स्पष्ट हो
इस प्रकरण में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ₹1,45,50,180 की कथित अनियमितता एवं अनधिकृत व्यय का उल्लेख और ₹12,26,456 की निर्धारित वसूली दो अलग-अलग आंकड़े हैं।
विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि कुल ऑडिट आपत्ति किन मदों में दर्ज हुई थी, निर्धारित वसूली किन व्यक्तियों या समितियों से संबंधित थी और दोनों राशियों के बीच क्या संबंध है।
साथ ही, ऑडिट आपत्तियों में से कितनी का निराकरण हुआ, कितनी राशि वसूल की गई और कितना मामला अभी लंबित है—इसका संस्थानवार विवरण सामने आना चाहिए।
अब जवाबदेही तय करने का समय
वर्ष 2020 की संपरीक्षा और वर्ष 2021 में जारी वसूली संबंधी पत्रों के बाद इस प्रकरण की वर्तमान स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। सरकारी धन से जुड़े मामलों में केवल पत्राचार पर्याप्त नहीं है; वास्तविक वसूली, अभिलेखों का सत्यापन और जिम्मेदारी का निर्धारण भी महत्वपूर्ण है।
अब निगाहें CMHO कार्यालय और संबंधित विभागीय अधिकारियों पर हैं। क्या लंबित वसूली की स्थिति स्पष्ट होगी? क्या ऑडिट आपत्तियों का निराकरण कराया जाएगा? और यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो क्या नियमानुसार कार्रवाई होगी?
इन सवालों के जवाब संबंधित विभाग के दस्तावेजों, वसूली के प्रमाण और आधिकारिक पक्ष से ही सामने आएंगे।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—वसूली के निर्देशों के बाद सरकारी अभिलेखों में क्या दर्ज है और इस पुराने प्रकरण का वास्तविक हिसाब कब सामने आएगा?

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