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अक्षय तृतीया: धर्म, प्रकृति और दान के ज़रिए सच्चे धन की फिर से खोज


अक्षय तृतीया: धर्म, प्रकृति और दान के ज़रिए सच्चे धन की फिर से खोज

 हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला पावन पर्व अक्षय तृतीया इस वर्ष भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया पुण्य, दान और शुभ कार्य कभी क्षय नहीं होता, बल्कि अक्षय फल देता है।

धार्मिक दृष्टि से इस दिन का विशेष महत्व है। पुराणों के अनुसार इसी तिथि पर भगवान भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म हुआ था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि इसी दिन महाभारत का लेखन प्रारंभ हुआ था।

इस अवसर पर लोग सोना-चांदी खरीदने, नए कार्यों की शुरुआत करने और विशेष रूप से दान-पुण्य करने को शुभ मानते हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि अक्षय तृतीया केवल भौतिक संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण, जरूरतमंदों की सहायता और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश भी देती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बदलते समय में इस पर्व को केवल खरीदारी तक सीमित न रखकर पर्यावरण के प्रति जागरूकता, जल संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे कार्यों से जोड़ना चाहिए। इससे समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा और “सच्चे धन” की अवधारणा मजबूत होगी।

शहर के मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गई। पूजा-अर्चना के साथ लोगों ने गरीबों को अन्न, वस्त्र और जल का दान कर इस पर्व का महत्व सार्थक किया।

निष्कर्ष:
अक्षय तृतीया हमें यह याद दिलाती है कि सच्चा धन केवल भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि अच्छे कर्म, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और मानवता की सेवा में निहित है।

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